सोमवार, 26 सितंबर 2011

नौ रूपों की आराधना का नवरात्रि पर्व

शारदीय नवरात्र में घटस्थापना मुहूर्त
पंडित विनोद चौबे -09827198828
शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना का पर्व नवरात्रि इस बार आठ दिन का होगा। नवरात्रि पर्व 28 सितंबर से शुरू होकर 5 अक्टूबर को समाप्त होगा। इस बार तृतीया तिथि क्षय हो रही है। द्वितीया व तृतीया तिथि एक ही दिन रहेगी। मां जगदंबा के भक्तों को 29 सितंबर को देवी ब्रह्मचारिणी और चंद्रघंटा की आराधना एक ही दिन करना होगा। यह संयोग सात साल बाद आ रहा है, जो दो साल लगातार रहेगा। 2012 में चतुर्थी तिथि का क्षय होने से नवरात्रि आठ दिनों की होगी।
28 सितम्बर, बुधवार के दिन हस्त नक्षत्र 16.21 तक है।
तत्पश्चात् चित्रा प्रारम्भ होगा, जो घटस्थापना में वर्जित माना जाता है।
बुधवार होने के कारण अभिजित भी वर्जित है।
इसलिए इस दिन घटस्थापना सूर्योदय के पश्चात द्विस्वभाव लग्न कन्या में ही करना श्रेष्ठ है।
घटस्थापना मुहूर्त प्रात: सुबह 6.22 बजे 7.50 बजे तक रहेगा।
 इसके अलावा सूर्योदय से 9.20 बजे तक लाभ और अमृत चौघडिया तथा सुबह 10.49 से दोपहर 12 बजे तक शुभ के चौघडिए में भी घट स्थापना की जा सकती है।
ज्योतिष के अनुसार नवरात्र स्थापना समय सुबह होता है। लेकिन यदि इस दौरान चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग आ जाता है तो वह शुभ नहीं रहता है।
इस बार मां दुर्गा का आगमन नौका पर व गमन मनुष्य के कंधे पर होगा, जो अति शुभ हैपुराण व अन्य धार्मिक ग्रंथों में भगवती के आगमन व प्रस्थान के लिए वाहन की चर्चा है. उन्होंने बताया कि माता का आगमन जनजीवन के लिए हर प्रकार की सिद्धि देने वाला है.
भगवती रविवार व सोमवार को गज (हाथी) पर, शनिवार व मंगलवार को तुरंग (घोड़ा) पर, गुरुवार व शुक्रवार को डोला पर और बुधवार को नौका पर आती हैं. प्रस्थान के संबंध में कहा गया है कि रविवार व सोमवार को महिष (भैसा) पर, शनिवार और मंगलवार को चरणायुद्ध वाहन पर, बुधवार व शुक्रवार को गज (हाथी) पर एवं गुरुवार को नर वाहन पर प्रस्थान करती हैं.

रविवार, 25 सितंबर 2011

अमर सिंह की तिहाड़ यात्रा

अमर सिंह की तिहाड़ यात्रा
-पं. विनोद चौबे

नोट के बदले वोट' मामले में पूर्व सपा नेता अमर सिंह के जेल जाने के बाद अब सवालों का तूफान कांग्रेस की तरफ मुड़ गया है। अमर की गिरफ्तारी से यह साफ हो गया है कि 2008 में मनमोहन सरकार बचाने के लिए बहुमत जुटाने की कवायद साफ सुथरी नहीं थी। यदि अमर सिंह ने वास्तविकता उगल दी तो सत्ताधारी कांग्रेस का क्या हश्र होगा...? इसको विपक्ष भुनाने में तनिक भी देर नहीं लगायेगा, जिसका प्रभाव उ.प्र.के विधान सभा चुनाव पर पड़ेगा। विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक जब से अमर सिंह तिहाड़ गयें हैं तभी से कांग्रेस 'नोट के बदले वोट' मामले को लेकर भारी पशोपेश में पड़ी है।
कांग्रेस के आकाओं की नजर अब सोनिया जी के देश लौटने पर टिकी हुयी है। उधर उ.प्र. के विधान सभा चुनाव को देखते हुए। कांग्रेस कोई नया खुलासा करते हुए अमर सिंह को कांग्रेस में शामिल कर मुंह न खोलने के एवज में उ.प्र. की कमान भी दिया जा सकता है। ताकि अमर सिंह उ.प्र.के सवर्णों का वोट कांग्रेस के पाले में डालने का काम करें वहीं दूसरी तरफ मुलायम सिंह को भी नुकसान पहुंचाने की मंशा अमर सिंह का भी पूरा हो सके। हॉलाकि कांग्रेस के तरफ से ऐसा न होने दावा किया जा रहा है, लेकिन अब देखना यह है कि अमर सिंह की चुप्पी क्या गुल खिलाती है..? मुंह खोलते हैं तो क्या फिर घर वापसी भी सम्भव है..? कुल मिलाकर कांग्रेस यह जरूर सोच रही होगी कि...अमर सिंह।़।़।़ प्लीज मुंह मत खोलना।

सरकार मनमोहन सिंह की बची। सरकार बचाने का इशारा मुलायम सिंह ने किया। लेकिन आज न तो कांग्रेस का हाथ है और न ही मुलायम सिंह का साथ। फिर भी अमर सिंह खामोश रहे और खामोशी से तिहाड़ जेल पहुंच गये। यह फितरत अमर सिंह की कभी रही नहीं। तो फिर वह कौन सी मजबूरी है जिसे अमर सिंह ओढ़े हुये हैं। क्योंकि वामपंथियों के समर्थन वापस लेने के बाद संकट में आयी सरकार को बचाने की पहल अगर 10 जनपथ से शुरु हुई थी तो सीधी शिरकत मनमोहन सिंह ने खुद की थी। और तभी मनमोहन सिंह का अमर प्रेम खुलकर दिखा था। याद कीजिये 2008 में जुलाई के पहले हफ्ते में मनमोहन सिंह के घर 7 रेसकोर्स का दरवाजा पहली बार मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह के लिये खुला था। तब प्रधानमंत्री ने सभी सहयोगियो को भोजन पर बुलाया था। और जिस टेबल पर अमर सिंह और मुलायम सिंह बैठे थे उसी टेबल तक चलकर खुद मनमोहन सिंह गये और साथ बैठकर गुफ्तगु के बीच जायके का मजा भी लिया था। उस वक्त यह सवाल सबसे बड़ा था कि सोनिया गांधी ने एक वक्त जब मुलायम-अमर सिह के लिये अपने दरवाजे बंद कर दिये तो फिर कांग्रेस में क्या किसी की हिम्मत होगी जो अमर सिंह के लिये दरवाजे खोले। लेकिन संकट सरकार पर था और लोकसभा में बहुमत का खेल मनमोहन सिंह सरकार को बचाने के लिये ही खेला जाना था तो फिर अमर सिंह के लिये दरवाजा भी 7 रेसकोर्स का ही खुला।
बडा सवाल यहीं से शुरु होता है कि आखिर अदालत की फटकार के बाद सीबीआई ने जब तेजी दिखायी तो सरकार बचाने वाले किरदार तो जेल चले गये। जिन्होंने सरकार बचाने के लिये खरीद-फरोख्त के इस खेल को पकड़ा वह भी जेल चले गये। लेकिन सरकार का कोई खिलाड़ी जेल क्यों नहीं गया और सीबीआई ने सत्ता के दायरे में हाथ क्यों नहीं डाला। यह सवाल इसलिये बड़ा है क्योकि अमर सिंह के आगे का रास्ता उस दौर में लालकृष्ण आडवाणी के राजनीतिक सचिव रहे सुधीन्द्र कुलकर्णी तक भी जाता है और अमर सिंह कुछ बोले तो कटघरे में सरकार और कांग्रेस के वैसे चेहरे भी खड़े होते दिखते हैं, जिन पर सोनिया गांधी को नाज़ है।
तो क्या अमर सिंह की खामोशी आने वाले वक्त में अपनी सियासी जमीन बनाने के लिये राजनीतिक सौदेबाजी का दायरा बड़ा कर रही है। या फिर अमर सिंह जेल से किसी राजनीतिक तूफान के संकेत देकर अपना खेल सत्ता -विपक्ष दोनो तरफ खेलने की तैयारी में हैं। चूंकि अमर सिंह की सियासी बिसात उत्तर प्रदेश के चुनाव से भी जुड़ी है और साथ ही इस दौर में सीबीडीटी और प्रवर्तन निदेशालय की जांच के घेरे में आयी उनकी फर्जी कंपनियो के फर्जी कमाई से भी जुड़ी है। कैश फार वोट की जांच करते करते सीबीआई ने अमर सिंह के उस मर्म को ही पकड़ा, जहां सियासी ताकत के जरीये अपने परिवार और दोस्तो की कमाई के लिये फर्जी कंपनी बनायी तो कमाई से सियासत में अपनी ताकत का अहसास कराते रहे। जिस पंकजा आर्टस नाम की कंपनी की सफेद जिप्सी में ही तीन करोड़ रुपया ले जाया गया, वह पंकजा आर्टस कंपनी में अमर सिंह और उनकी पत्नी की हिस्सदारी है। सीबीडीटी की रिपोर्ट बताती है कि अमर सिंह करीब 45 कंपनियो से किसी ना किसी रुप में जुड़े हैं, जिनके खिलाफ जांच चल रही है।
इन सभी कंपनियों पर सत्ता की प्यार भरी निगाहें तब तक रहीं जब तक अमर सिंह सत्ता में रहे या फिर सत्ता से सौदेबाजी करने की हैसियत में रहे। और सौदेबाजी के इसी दायरे ने उन्हे पावर सर्किट के तौर पर स्थापित भी किया और संकट के दौर में हर किसी के लिये संकट मोचक भी बने। इसलिये जब जब अमर सिंह जांच के दायरे में इससे पहले आये उन्होने सत्ता को भी लपेटा और विपक्ष को भी। बीमारी में मित्र अरुण जेटली के देखने आने को भी इस तरह याद किया जैसे बीजेपी से उनका करीबी नाता है और सरकार बचाने के दौर में काग्रेस के सबसे ताकतवर अहमद पटेल को भी मित्र कहकर यह संकेत देने से नहीं चूके कि उनकी सियासी बिसात पर राजनीतिक सौदेबाजी ही प्यादा भी है और राजा भी। क्योंकि अमर सिंह की शह देने में ही सामने वाले की मात होती और वही से अमर सिंह का आगे का रास्ता खुलता। और यही बिसात हमेशा अमर सिंह को भी बचाती रही। लेकिन पहली बार सौदेबाजी का दायरा बडा होने के बावजूद अमर सिंह का अपना संकट दोहरा है क्योंकि सरकार के सामने भ्रष्ट्राचार पर नकेल कसने की चुनौती है। और देश ने अन्ना आंदोलन के जरीये सत्ता को अपनी ताकत का एहसास करा भी दिया है। इसलिेए अब सवाल यह है कि अमर सिंह के तिहाड जेल जाने के बाद सरकार कितने दिन तक खामोशी ओढे रह सकती है । बीजेपी सिर्फ सरकार पर वार कर अपने सांसदो को व्हीसल ब्लोअर का तमगा देते हुये गिरफ्तारी के तार सुधीन्द्र तक पहुंचने से रोक पाती है। समाजवादी पार्टी अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिये सौदेबाजी का दोष काग्रेस या सरकार पर मढ़ कर अमर प्रेम जताती रहती है जिससे यूपी चुनाव में भ्रष्ट होने के दाग उस पर न लगे। या फिर सभी एक साथ खड़े होकर अमरसिंह की बिसात पर प्यादा बनकर सियासी सौदेबाजी में सबकुछ छुपाने में भिड़ते हैं। और संसदीय लोकतंत्र यह सोच कर ठहाके लगाने को तैयार है कि जिस स्टैडिंग कमेटी के पास भ्रष्टाचार पर नकेल कसने वाला जनलोकपाल बिल पडा है छह दिन पहले तक उसी स्टैडिंग कमेटी के सदस्य के तौर पर अमर सिंह भी थे।
यह अलग बात है कि संसद के भीतर अपराध करने के आरोप में फिलहाल अमर सिंह तिहाड जेल में हैं। इसी आधार पर विपक्ष ने कांग्रेस को घेरना और प्रधानमंत्री से जवाब मांगना शुरू कर दिया, क्योंकि अमर सिंह कांग्रेस सरकार बचाने की कोशिशों के सूत्रधार थे। जबकि कोर्ट और कानून का हवाला देकर कांग्रेस अपना पल्ला झाडऩे में लग गई है।
क्या था मामला:
तीन वर्ष पहले अमेरिका के साथ नाभिकीय करार पर मचे राजनीतिक उफान और वामदलों की समर्थन वापसी के बाद अमर सिंह ने न सिर्फ सरकार को बचाने में बल्कि करार को अंजाम तक पहुंचाने में भी मदद की थी। उसी अहम पड़ाव पर सरकार को सांसदों के वोट की जरूरत हुई थी और विपक्ष के कई सदस्य सरकार के साथ खड़े थे।
अमर सिंह की भूमिका इसलिए भी अहम मानी जाती है क्योंकि सपा के शुरुआती विरोध के बाद उन्होंने ही पार्टी का रुख बदलवाया था।
नोट के बदले वोट प्रकरण सीधे तौर पर भले ही सरकार के विश्वास प्रस्ताव से जुड़ा हो, इसकी पूरी पृष्ठभूमि परमाणु करार से जुड़ी थी।
दरअसल इसी करार के विरोध में वामदलों ने समर्थन वापस लेकर सरकार को अल्पमत में ला दिया था। दबाव में आई सरकार 22 जुलाई 2008 को लोकसभा में विश्वास प्रस्ताव लेकर आई थी। संप्रग सरकार 5 वोट के मामूली अंतर से बची थी। सरकार के पक्ष में 268 वोट पड़े थे जिसमें सपा के भी 37 वोट शामिल थे। जबकि विरोध में 263 वोट पड़े थे।
मतदान का रोचक पहलू यह था कि विपक्ष के कई सांसद सरकार के साथ खड़े थे, लेकिन वोटिंग की इस जीत से पहले भाजपा के अशोक अर्गल, फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर भगौरा ने लोकसभा के अंदर कथित तौर पर रिश्वत में दिए गए रुपये दिखाकर सनसनी फैला दी थी।
तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने पुलिस को इस मामले की जांच के लिए कहा था। बाद में राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप के बीच कुछ अन्य लोगों के साथ साथ अमर सिंह का भी नाम आया
वहीं कुछ महीने पहले हुए विकिलीक्स खुलासे में कहा गया कि कांग्रेस नेता के एक सहयोगी नचिकेता कपूर ने अमेरिकी दूतावास के एक अधिकारी को बताया था कि सरकार बचाने के लिए कुछ सांसदों को रिश्वत दे दी गई है।
इधर, जनवरी 2009 से शुरू हुई पुलिस जांच में तब तेजी आई जब अप्रैल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने लताड़ लगाया था। उसके बाद कभी अमर सिंह जुड़े रहे संजीव सक्सेना और भाजपा के कार्यकर्ता सुहैल हिंदुस्तानी को गिरफ्तार किया गया था। अमर सिंह के रूप में पहली बड़ी गिरफ्तारी हुई है।
(समाचार लिखने तक अमर सिंह तिहाड़ जेल में थे)

नवदुर्गा


नवरात्र में श्री दुर्गा सप्तशती महायज्ञ
-पंडित विनोद चौबे ०९८२७१९८८२८, भिलाई  
भगवती शक्ति एक होकर भी लोक कल्याण के लिए अनेक रूपों को धारण करती है। श्ेवतांबर उपनिषद के अनुसार यही आद्या शक्ति त्रिशक्ति अर्थात महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती के रूप में प्रकट होती है। इस प्रकार पराशक्ति त्रिशक्ति, नवदुर्गा, दश महाविद्या और ऐसे ही अनंत नामों से परम पूज्य है।
श्री दुर्गा सप्तशती नारायणावतार श्री व्यासजी द्वारा रचित महा पुराणों में मार्कण्डेयपुराण से ली गयी है। इसम सात सौ पद्यों का समावेश होने के कारण इसे सप्तशती का नाम दिया गया है। तंत्र शास्त्रों में इसका सर्वाधिक महत्व प्रतिपादित है और तांत्रिक प्रक्रियाओं का इसके पाठ में बहुधा उपयोग होता आया है। पूरे दुर्गा सप्तशती में 360 शक्तियों का वर्णन है। इस पुस्तक में तेरह अध्याय हैं। शास्त्रों के अनुसार शक्ति पूजन के साथ भैरव पूजन भी अनिवार्य माना गया है। अत: अष्टोत्तरशतनाम रूप बटुक भैरव की नामावली का पाठ भी दुर्गासप्तशती के अंगों में जोड़ दिया जाता है। इसका प्रयोग तीन प्रकार से होता है।
1.     नवार्ण मंत्र के जप से पहले 'भैरवजी के मूल मंत्रÓ का 108 बार जप।
2.     प्रत्येक चरित्र के आद्यान्त में 1-1 पाठ।
3. प्रत्येक उवाचमंत्र के आस-पास संपुट देकर पाठ।
नैवेद्य का प्रयोग अपनी कामनापूर्ति हेतु दैनिक पूजा में नित्य किया जा सकता है। यदि मां दुर्गाजी की प्रतिमा कांसे की हो तो विशेष फलदायिनी होती है।
श्री दुर्गासप्तशती का अनुष्ठान कैसे करें।
1. कलश स्थापना
2. गौरी गणेश पूजन
3. नवग्रह पूजन
4. षोडश मातृकाओं का पूजन
5. कुल देवी का पूजन
6. मां दुर्गा जी का पूजन निम्न प्रकार से करें।
आवाहन : आवाहनार्थे पुष्पांजली सर्मपयामि।
आसन : आसनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि।
पाद : पाद्यर्यो: पाद्यं समर्पयामि।
अघ्र्यम्: हस्तयो: अघ्र्यम् स्नान: ।
आचमन: आचमन समर्पयामि।
स्नान: स्नानादि जलं समर्पयामि।
स्नानांग: आचमन: स्नानन्ते पुनराचमनीयं जलं समर्पयामि।
दुग्ध स्नान: दुग्ध स्नान समर्पयामि।
दहि स्नान: दधि स्नानं समर्पयामि।
घृत स्नान: घृतस्नानं समर्पयामि।
शहद स्नान: मधु स्नानं सर्मपयामि।
शर्करा स्नान: शर्करा स्नानं समर्पयामि।
पंचामृत स्नान: पंचामृत स्नानं समर्पयामि।
गन्धोदक स्नान: गन्धोदक स्नानं समर्पयामि
शुद्धोदक स्नान: शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि
वस्त्र: वस्त्रं समर्पयामि
सौभाग्य सूत्र: सौभाग्य सूत्रं समर्पयामि
चंदन: चंदनं समर्पयामि
हरिद्रा: हरिद्रा समर्पयामि
कुंकुम: कुंकुम समर्पयामि
आभूषण: आभूषणम् समर्पयामि
पुष्प एवं पुष्प माला: पुष्प एवं पुष्पमाला समर्पयामि
फल: फलं समर्पयामि
भोग (मेवा): भोगं समर्पयामि
मिष्ठान: मिष्ठानं समर्पयामि
धूप: धूपं समर्पयामि।
दीप: दीपं दर्शयामि।
नैवेद्य: नैवेद्यं निवेदयामि।
ताम्बूल: ताम्बूलं समर्पयामि।
भैरवजी का पूजन करें इसके बाद कवच, अर्गला, कीलक का पाठ करें। यदि हो सके तो देव्यऽथर्वशीर्ष, दुर्गा की बत्तीस नामवली एवं कुंजिकस्तोत्र का पाठ करें।
नवार्ण मंत्र: 'ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चैÓ का जप एक माला करें एवं रात्रि सूक्त का पाठ करने के बाद श्री दुर्गा सप्तशती का प्रथम अध्याय से पाठ शुरू कर तेरह अध्याय का पाठ करें। पाठ करने के बाद देवी सूक्त एवं नर्वाण जप एवं देवी रहस्य का पाठ करें। इसके बाद क्षमा प्रार्थना फिर आरती करें। पाठ प्रारंभ करने से पहले संकल्प अवश्य हो। पाठ किस प्रयोजन के लिए कर रहे हैं यह विनियोग में स्पष्ट करें।
दुर्गासप्तशती के पाठ में ध्यान देने योग्य कुछ बातें
1. दुर्गा सप्तशती के किसी भी चरित्र का आधा पाठ ना करें एवं न कोई वाक्य छोड़े।
2. पाठ को मन ही मन में करना निषेध माना गया है। अत: मंद स्वर में समान रूप से पाठ करें।
3. पाठ केवल पुस्तक से करें यदि कंठस्थ हो तो बिना पुस्तक के भी कर सकते हैं।
4. पुस्तक को चौकी पर रख कर पाठ करें। हाथ में ले कर पाठ करने से आधा फल प्राप्त होता है।
5. पाठ के समाप्त होने पर बालाओं व ब्राह्मण को भोजन करवाएं।
अभिचार कर्म में नर्वाण मंत्र का प्रयोग
1. मारण : ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै देवदत्त रं रं खे खे मारय मारय रं रं शीघ्र भस्मी कुरू कुरू स्वाहा।
2. मोहन : क्लीं क्लीं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे देवदत्तं क्लीं क्लीं मोहन कुरू कुरू क्लीं क्लीं स्वाहा॥
3. स्तम्भन : ऊँ ठं ठं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे देवदत्तं ह्रीं वाचं मुखं पदं स्तम्भय ह्रीं जिहवां कीलय कीलय ह्रीं बुद्धि विनाशय -विनाशय ह्रीं। ठं ठं स्वाहा ॥
4. आकर्षण : ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे देवदतं यं यं शीघ्रमार्कषय आकर्षय स्वाहा॥
5. उच्चाटन : ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे देवदत्त फट् उच्चाटन कुरू स्वाहा।
6. वशीकरण : ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे देवदत्तं वषट् में वश्य कुरू स्वाहा।
नोट : मंत्र में जहां देवदत्तं शब्द आया है वहां संबंधित व्यक्ति का नाम लेना चाहिए।


श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ से कैसे करें मनोकामना पूर्ति..
अध्याय        फल
प्रथम अध्याय    हर प्रकार की चिंता को समाप्त करने के लिए
द्वितीय अध्याय    शत्रु पीड़ा, मुकदमा आदि में विजय के लिए
तृतीय अध्याय    शत्रु दमन
चतुर्थ अध्याय    देवी दर्शन प्राप्त करने के लिए
पंचम अध्याय    देवी भक्ति प्राप्त करने के लिए
षष्ठम अध्याय    दु:ख, भय, व्यापार बाधा निवारण हेतु.
सप्तम अध्याय    मनोवांछित फल प्राप्ति हेतु.
अष्टम अध्याय    वशीकरण एवं मित्रता में प्रगाढ़ता के लिए.
नवम अध्याय    सन्तान प्राप्ति और उन्नति सहित हर प्रकार की कामना पूर्ति हेतु.
दशम अध्याय     राज सत्ता व राजसुख के लिए.
एकादश अध्याय व्यापार उन्नति के लिए.
द्वादश अध्याय    यश और लोकप्रियता के लिए.
त्रयोदश अध्याय    पुन: राज्यस्थापन एवं सत्ता सुख के लिए
तिथियों पर आधारित दुर्गापाठ का फल
1. पूर्णिमा के दिन पाठ व देवी पूजन से सिद्धियों की प्राप्ति होती है.
2. शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को पाठ करने से सुख-समृद्धि घर आती है.
3. शुक्ल पक्ष की अष्टमी और नवमी को पाठ करने से राजयोग और राजसुख की प्राप्ति.
4. शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तथा नवमीं को पाठ करने से भक्ति एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है.
5. शुक्ल पक्ष की षष्ठी से लेकर आगामी नित्य 9 दिनों तक पाठ करने मात्र से अष्ट सिद्धि और 9 निधियों की प्राप्ति होती है.
6. शुक्ल पक्ष की अष्टमी से अगले माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी पर्यंत लगातार एक माह पाठ करने से भूत-प्रेत आदि दोष समाप्त.श्री दुर्गा सप्तशती के साप्ताहिक दिनों के अनुसार पाठ का फल
1. रविवार : इस दिन पाठ करने से 9 पाठ के बराबर फल प्राप्त होता है.
2. सोमवार : इस दिन पाठ करने से अमोघ फल की प्राप्ति होती है.
3. मंगलवार : इस दिन पाठ करने से 108 पाठ का फल प्राप्त होता है.
4. बुधवार : इस दिन पाठ करने से 1 लाख दुर्गा पाठ का फल प्राप्त होता है.
5. बृहस्पतिवार : इस दिन पाठ करने से सवा लाख दुर्गा पाठ का फल प्राप्त होता है.
6. शुक्रवार : इस दिन पाठ करने से दो लाख दुर्गा पाठ करने का फल प्राप्त होता है.
7. शनिवार : इस दिन पाठ करने से अनंत गुना दुर्गा पाठ का फल प्राप्त होता है.नवरात्र में नैवेद्य से कामना पूर्ति
दिवस      नैवेद्य        कामना पूर्ति
प्रथम    गाय का घी    रोगों का शमन
द्वितीया    शक्कर / गुड़    दीर्घायु के लिए
चतुर्थी    खीर / मालपुआ    नेतृत्व एवं आत्म विश्वास के लिए
पंचमी    केला    व्यापार वृद्धि हेतु
षष्ठी    शहद    दिव्याकर्षण हेतु
सप्तमी    छुआरा / गुड़    गृहबाधा शांति हेतु
अष्टमी    नारियल    गृह कलह शांति हेतु
नवमी    काला तिल    रोग एवं प्रेतादि दोष शमन के लिए
नोट : अनार का फल, खीर, अखरोट, नारियल, पान सुपारी और गुड़हल पुष्प प्रतिदिन चढ़ाना चाहिए। माताजी को दुर्वा चढ़ाना बिल्कुल वर्जित है।

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

हिंदी दिवस औपचारिकता या आवश्यकता

हिंदी दिवस औपचारिकता या आवश्यकता 
-हृषिकेश त्रिपाठी,भिलाई  
नयी भारतीय सभ्यता का प्रतीक बनती ''इंगलिश अब तेजी से अपने पैर अत्याधुनिक यंत्रो मोबाइल,इंटरनेट आदि के माध्यम से पसारते जा रही है।
इंटरनेट पर अब लैटिन के साथ-साथ देवनागरी लिपि में खोज करना सुगम हो गया है। इस बात सक कुछ हिंन्दी प्रेमियों को यह प्रसन्नता अवश्य हुई होगी कि अब शायद हिंदी के पढऩे लिखने, वालो की तादात बढ़ेगी। हिंदी को लेकर उछलकूद, (धींगामुश्ती) बस 14 सितंबर के बाद पख्वाड़े भर ही दिखती है। फिर सब कुछ टांय-टांय फिस्स क्योंकि लोगो ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी दिवस जो घोषित कर दिया है। तो इतनी कवायद तो जरूर है ना?
    वैसे लगता है कि हमें अंग्रेजी नही आती और हिंदी आती है इसीलिए पठन-पाठन एवं लेखन का कार्य हिंदी में किया जाना उचित लगता है, नही तो जिन्हें थोड़ी बहुत भी अंग्रेजी आती है वे दो-चार शेक्सपियर ओर चेतनभगत तक के बीच के लेखकों का नाम व उनकी ख्यातिलब्ध रचनाओं का नाम लेकर ही अपनी परिपक्वता दर्शाने का प्रयास करते हैं। व्यवासीयकरण के इस दौर में जहां उच्च वर्ग, उच्च मध्यम वर्ग, के बच्चों के अभिभावक एक अदद नौकरी पाने के लिए बच्चों के अंदर अंग्रेजी कम और अंग्रेजियत ज्यादा ठँूस रहे हैं, वहाँ यह आशा करना ही निरर्थक है कि भविष्य में हिंदी का प्रचार -प्रसार बढ़ेगा ।
अभी-अभी कुछ दिनो पूर्व यहां सरकारी विद्यालय एवं महाविद्यालयों के प्रति कम होता रूझान और निजी विद्यालयों व महाविद्यालयों के प्रति बढ़ती लिप्सा हिंदी के प्रति उपेक्षा को दर्शाती प्रतीत होती है। ट्रेन,बस,घर अथवा निजी कार्यालय में हिंदी अखबार,पत्रिका लेकर पढऩा ''आउट ऑफ  फैशनÓÓ और अंगेजी एवं पत्रिका को उलटते-पुलटते रहना 'फैशनेबलÓ माना जाने लगा है। महानगरों में अब हिंदी भाषा-भाषी चलन मे अब ऐसे उपेक्षित हैं जैसे अंगेजो के जमाने में भारतीय। भले ही राजभाषा कही जाने वाली हिंदी के लिए गूगल का देवनागरी करण हो जाए किंतु जब तक हिंदी को आदत में शुमार नही किया जाएगा तब तक इसका चलन में आना कठिन हैं। ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हिंदी भी लुप्त प्राय भाषाओं की श्रेणी मे परिलक्षित होने लगेगी।
हिंदी पढऩे एवं लिखने वालों की संख्या में कमी और इंगलिश पढऩे वालों की जनसंख्या में होती वृद्धि इंगित कर रही है कि कैसे लोगो का पाश्चात्यीकरण हो रहा है, और पड़ोसी के समक्ष अपने 3 वर्ष के बच्चे से अंग्रेजी में कविता सुनवाने का दम भरने वाले लोग किस मार्ग पर जा रहें हैं।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि हिंदी-दिवस और पखवाड़े मनाए जाएँ बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी को सामान्य समाज की आदत में शामिल किया जाय। क्षेत्रवाद,क्षेत्रीयभाषा एवं जातिवाद के नाम पर हो रहे हिंदी भाषा पर कुठाराघातों को रोका जाय। निम्न तबके के लोगों की, जो मजबूरी में हिंदी विद्यालयों अथवा महाविद्यालयों  में पढ़ते हों इंटरनेट की सुविधा सस्ती उपलब्ध कराई जाय ताकि आने वाले दिनों में हिंदी की व्यापकता का दम उन्हें भी स्वयं में दिखे। हिंदी भाषा के लिए मात्र एक दिन हिंदी दिवस मनाकर  पूर्ण करना, कहाँ तक उचित है?

छत्तीसगढ़ में संस्कृत को चाहिए संजीवनी

छत्तीसगढ़  में संस्कृत को चाहिए संजीवनी  
छत्तीसगढ़ संस्कृत विद्यामंडलम के अध्यक्ष डॉ. गणेश कौशिक के मुताबिक राज्य में संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन को बेहतर बनाने के अलावा रोजगारपरक बनाये जाने पर ज्यादा जोर दिया जायेगा, जो आगामी शिक्षा सत्र से राज्य में कम से कम 100 नए संस्कृत विद्यालय प्रारंभ करने की योजना है, राज्य के लिए बेहद आवश्यक था। प्रदेश में मरणासन्न शय्या पर कराहती संस्कृत-भाषा के लिए संजीवनी का काम करेगी,जरूरत है इस दिशा में कठोर कदम उठाने की।
छत्तीसगढ़ मे संस्कृत के शताधिक विद्यालयों का खोला जाना स्वागतेय है, किन्तु आम जनमानस को संस्कृत के प्रति आकर्षित करना अत्यंत कठिन है। आज कोई भी छात्र का अभिभावक बच्चे को स्कूल व विद्यालय भेजने से पहले सम्भावनाओं को तलाशता है..? अतएव इस शिक्षा के विस्तार के साथ-साथ सम्भावनाओं और रोजगारपरक बनाने पर बल देना बेहद जरूरी होगा । प्रदेश सरकार द्वारा की जा रहीं शिक्षा कर्मियों के नियुक्तियों में संस्कृत के अध्यापकों के लिए सुरक्षित करना, पीएमटी, इंजीनियरिंग, शासकीय राजस्व आदि सभी क्षेत्रों में रोजगार मुहैया कराने,  जैसा ठोस कदम उठाना होगा। संस्कृत किसी वर्ग विशेष का शिक्षा नहीं बल्कि चहुँमुखी रोजगार शिक्षा के रूप में स्वयमेव आम जनमानस को अपनी तरफ आकर्षित करे।
क्योंकि यदि केन्द्रीय शिक्षा नीति पर बात की जाय तो पिछले कुछ दिनों पूर्व  त्रिभाषा फार्मूले की राष्ट्रीय भाषा नीति का उल्लंघन करते हुए सीबीएसई ने हाल ही में 9वीं-10वीं कक्षा के स्कूली पाठ्यक्रम के बाबत जो नया आदेश जारी किया है. उससे सन् 1992 में संसद द्वारा स्वीकृत राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर प्रश्नचिह्न तो लगता ही है, संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल संस्कृत भाषा के मौलिक अधिकारों पर भी कुठाराघात हुआ है. वर्षों से चले आ रहे पुराने सीबीएसई पाठ्यक्रम के अनुसार तृतीय भाषा या फिर अतिरिक्त छठे विषय के रूप में संस्कृत भाषा को पढ़ा जा सकता था किन्तु बोर्ड द्वारा जारी नई द्विभाषा नीति के लागू होने तथा अतिरिक्त छठे विषय के प्रावधान को हटा देने की वजह से स्कूलों में संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन की बची-खुची संभावना भी पूरी तरह से समाप्त हो गई है. सीबीएसई के इस नए फैसले से पब्लिक स्कूलों ने अब संस्कृत की पढ़ाई बंद करके उसके स्थान पर जर्मन और फ्रेंच भाषाओं को पढ़ाना शुरू कर दिया है इस कारण हजारों संस्कृत छात्रों-अध्यापकों का भविष्य खतरे में पड़ गया है.
संस्कृत के साथ हो रहे इस अन्याय को देखते हुए इसके संगठनों में गम्भीर प्रतिक्रिया हुई है. 'दिल्ली संस्कृत अकादमी' द्वारा आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोर्ड द्वारा जारी संस्कृत विरोधी शिक्षा नीति की घोर निंदा की गई थी.
'संस्कृत कमीशन' तथा ' यूजीसी'  की सिफारिश के अनुसार संस्कृत भाषा और साहित्य की वर्तमान संदर्भ में उपयोगिता को चरितार्थ करने के लिए स्कूली पाठ्यक्रम में भाषा का माध्यम चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता दी जानी चाहिए. किंतु सीबीएसई ने 'संस्कृत कमीशन' और 'यूजीसी' की इन सिफारिशों को दरकिनार करते हुए अपने तुगलकी फरमान द्वारा 9वीं-10 वीं कक्षा के प्रारम्भिक स्तर पर ही संस्कृत विषय का चयन करने वाले छात्रों के लिए संस्कृत भाषा का माध्यम अनिवार्य कर दिया ताकि छात्र इस भाषा को कठिन मानकर फ्रेंच या जर्मन पढ़ सकें. बोर्ड द्वारा अपनाई गए इस संविधान विरुद्ध भाषाई दुराग्रह का मुख्य कारण है संस्कृत को जन-सामान्य से दूर रखना और इसके राष्ट्रव्यापी प्रचार-प्रसार पर अंकुश लगाना ही साबित हुआ .
दरअसल, सीबीएसई का पुराना इतिहास रहा है कि वह  कभी मातृभाषा या कभी क्लासिकल भाषा बताकर संस्कृत को स्कूली पाठ्यक्रम से बाहर रखने की रणनीति बनाता आया है. सन् 1986 में जब सरकार द्वारा नई शिक्षा नीति की बुनियाद रखी गई तब भी बोर्ड ने स्कूली पाठ्यक्रम से संस्कृत विषय को ही समाप्त कर दिया और लम्बे संघर्ष तथा सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से संस्कृत की पुन: बहाली हो सकी.
4 अक्टूबर 1994 को सर्वोच्च न्यायालय ने स्कूली पाठ्यक्रम में संस्कृत भाषा के महत्त्व को रेखांकित करते हुए अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि किसी देश की सीमा के साथ उसकी संस्कृति की रक्षा भी मुख्य राष्ट्रीय दायित्व होता है. हम भारतवासियों के लिए संस्कृत का अध्ययन देश की सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा के लिए किया जाता है. यदि शैक्षिक पाठ्यक्रम से संस्कृत को हतोत्साहित किया जाएगा तो हमारी संस्कृति की धारा ही सूख जाएगी. इन्हीं टिप्पणियों के साथ न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह तथा न्यायमूर्ति बी. एल. हनसेरिया ने सीबीएसई को स्कूली पाठ्यक्रम में संस्कृत को एक वैकल्पिक विषय के रूप में पढ़ाने का आदेश जारी किया. अदालत ने पाठ्यक्रम निर्माताओं को इस तथ्य से भी अवगत कराया कि संविधान की आठवीं अनुसूची में संस्कृत को इसलिए शामिल किया गया ताकि देश की संस्कृति को अभिव्यक्ति प्रदान करने वाली हिन्दी शब्दावली के विकास में मुख्य रूप से संस्कृत से सहयोग लिया जा सके.
संस्कृत कमीशन की रिपोर्ट हो या सर्वोच्च न्यायालय का फैसला सभी ने स्कूली पाठ्यक्रम में एक वैकल्पिक विषय के रूप में संस्कृत को पढ़ाए जाने की जरूरत इसलिए समझी ताकि इस भाषा के शिक्षण से छात्रों को अपने देश की सांस्कृतिक परम्पराओं का ज्ञान हो सके. संस्कृत पाठ्यक्रम से सम्बन्धित सन् 1988 की यूजीसी की रिपोर्ट के अनुसार स्कूली स्तर पर संस्कृत शिक्षा के तीन उद्देश्य बताए गए हैं-चरित्र निर्माण, बौद्धिक योग्यताओं का समुचित विकास तथा राष्ट्रीय धरोहर का संरक्षण. पर चिंता का विषय है कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलन के राष्ट्रीय संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करने वाली संस्कृत भाषा आज संकट के दौर से गुजर रही है.
अभी कुछ वर्ष पूर्व अमेरिकी प्राच्यविद्या मनीषी प्रोफेसर सैल्डन पोलॉक जब केरल स्थित संस्कृत कालेज में व्याख्यान देने आए थे तो उन्होने भी चिंता व्यक्त की कि, जिस संस्कृत विद्या को अमेरिका आदि विभिन्न देशों में गहरी रुचि लेकर पढ़ाया जाता है वही संस्कृत अपने ही देश में अस्तित्व को बचाने के दौर से गुजर रही है. यदि भारत में संस्कृत को मर जाने दिया गया तो यह विश्व की एक बहुत बड़ी सांस्कृतिक धरोहर की हत्या होगी. सैल्डन पोलॉक के अनुसार ब्रिटिशकालीन उपनिवेशवादी शिक्षानीति जो अंग्रेजी के वर्चस्व को स्थापित करने के लिए सदैव प्रयासरत रहती है, संस्कृत शिक्षा को भारत में हतोत्साहित करती आई है.
गांधी जी ने 'संस्कृति को दबाने वाली अंग्रेजी भाषा को अंग्रेजों की तरह ही यहां से निकाल बाहर करने' के आग्रह से राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति में संस्कृत शिक्षा पर विशेष बल दिया था.
संस्कृत पिछले दस हजार वर्षों के भारतीय ज्ञान-विज्ञान की संवाहिका 'हैरिटेज' भाषा भी है. इसलिए भारतीय संसद द्वारा स्वीकृत 'संस्कृत कमीशन' की रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा व्यवस्था में संस्कृत को राष्ट्रीय अस्मिता के संरक्षण की दृष्टि से भी विशेष प्रोत्साहन दिया जाना जरूरी है.ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार ने संस्कृत शिक्षा के प्रति गंभीर होकर संस्कृत शिक्षा बोर्ड के अंतर्गत आगामी सत्र तक 100 संस्कृत विद्यालयों के खोले जाने व बोर्ड के अध्यक्ष गणेश कौशिक के अनुसार संस्कृत शिक्षा को रोजगार परक बनाने की पहल अत्यंत प्रशंसनीय है। लेकिन देखना यह है कि, राज्य सरकार द्वारा किया गया यह पहल क्या रंग लाता है।
- पं. विनोद चौबे (पत्रिका के संपादक)

रविवार, 18 सितंबर 2011

हिन्दी मेरी पहचान है...सम्पादकीय

2009 से निरंतर २६ वां अंक '' ज्योतिष का सूर्य '' इस बार दीपावली विशेषांक के रूप में नये साज-सज्जा के साथ दिल्ली, छत्तीसगढ़, झारखंड, उ.प्र, एवं मध्य प्रदेश के १००४ अधिकृत बुकस्टॉलों पर उपलब्ध। यह आवरण पृष्ठ प्रस्तुत है..
हिन्दी मेरी पहचान है...सम्पादकीय
भाषा न केवल अभिव्यक्ति का एक माध्यम है बल्कि वह चिंतन को भी प्रभावित करती है। उसके साथ उसके बोलने वालों की संस्कृति और संस्कार भी जुडे होते हैं। भाषा केवल मस्तिष्क को झकझोरनेवाली ही नहीं, वरन हृदय को छूनेवाली भी होती है और यह ताकत अपनी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा में विशेष रूप से होती है।
हमारे देश में अनेक भाषाएं हैं और सबकी अपनी-अपनी समृद्ध संस्कृति और परंपराएं हैं। लेकिन इसके बावजूद हमारा अतीत एक है, अतीत के हमारे अनुभव एक हैं तथा हमारा चिंतन एक है। राष्ट्रीय स्वाभिमान और स्वतंत्रता की लडाई में पूरे भारत ने एकजुट होकर भाग लिया था। अंग्रेजी दासता का अनुभव पूरे भारत को एक जैसा है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक का संपूर्ण भारत हमेशा एक जैसे विचारों और भावनाओं से आंदोलित रहा है। सभ्यता और संस्कृति के आरंभिक काल से ही इस एक से चिंतन ने पूरे देश में एक सी संवेदनाओं को जन्म दिया है। तभी तो उत्तर भारत में रचित वेदों के भाव ज्यों के त्यों दक्षिण में रचित तिरुक्कुरल के भावों से मिल जाते हैं। नरसी मेहता, नामदेव, संत तुकाराम, एकनाथ, कबीर, सूर, मीरा, तुलसी, गुरुनानक, शंकरदेव, चैतन्य महाप्रभु आदि संतों की शिक्षाएँ स्थानविभेद होने पर भी भाव साम्य रखती हैं। इसीलिए हमें एक ऐसी भाषा की आवश्यकता है, जो हमारे इस ऐक्य को एक भाषा में व्यक्त कर सके। अपनी विशिष्ट ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के कारण हिंदी ही वह भाषा हो सकती है।
किसी भी संप्रभु व लोकतांत्रिक देश की एक राष्ट्र मुद्रा, एक राष्ट्रगान, एक राष्ट्रध्वज व एक राष्ट्र्रभाषा होती है। भारत अनेक भाषाभाषी लोगों का देश है और सभी की अपनी-अपनी समृद्ध संस्कृति व परम्पराएं हैं। अत: संवैधानिक रूप से देश की भाषाओं को राष्ट्रीय भाषाओं का सम्मान प्राप्त है। इन सबके बीच सम्पर्क और सामंजस्य स्थापित करने हेतु हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया। हिंदी को सम्पर्क राजभाषा घोषित करने का सीधा और सरल सा कारण यह था कि देश में इस भाषा को बोलने और समझने वाले सबसे अधिक थे। आज देश के दो तिहाई राज्यों में सत्रह बोलियों के रूप में हिंदी का विस्तार है। हिंदी भारत में सबसे अधिक बोली व समझी जाने वाली तथा विश्व में सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली व समझी जानेवाली तीसरी बड़ी भाषा है। इसे दुनिया भर में एक अरब से अधिक लोग जानते, पढ़ते, समझते और बोलते हैं।
स्वतंत्र भारत की बागडोर संभालने वाले नेताओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे गृहमंत्री पी चिंदबरम ने राजभाषा विभाग द्वारा हिन्दी दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में  किसी सार्वजनिक मंच पर लोगों को पहली बार हिन्दी में सम्बोधित किया। माना जाता है  कि तमिल भाषी चिदंबरम को हिन्दी बोलने में कठिनाई होती है। परंतु हिन्दी के उत्थान के लिहाज से देखा जाये तो इस प्रकार के अंग्रेजियत के पुजारी नेताओं पर शर्म आती है। जो हिन्दी के उत्थान की बात करते हों लेकिन उन्हे हिन्दी बोलना नहीं आता है। आस्ट्रेलिया से पढ़ाई कर स्वदेश लौटे महात्मा गांधी  की मुलाकात गोपालकृष्ण गोखले जी से हुई और उन्होने गोपालकृष्ण गोखले जी को अपना आदर्श और गुरू मानते हुए। देश के आजादी की लड़ाई में सम्मिलित हो गए लेकिन उन्होने कभी अंग्रेजी में सम्बोधन नहीं किया बल्कि ब्रिटिश अधिकारियों से उनकी बात अंग्रेजी में ही होती थी।
हिंदी के मामले में ढुलमुल नीति अपनाते हुए उपनिवेशवादी मानसिकता रखने वाले अंग्रेजीपरस्त राजनेताओं की पश्चिमी जीवनशैली व सोच के दबाव में 10 वर्षों के लिए अंग्रेजी को हिंदी की स्थानापन्न भाषा घोषित कर दिया गया। परिणाम यह हुआ कि हिंदी को एकमेव राजभाषा बनाने का मुद्दा भाषावादी व प्रांतवादी राजनीति में उलझ गया और चौसठ वर्ष बीत जाने पर भी हिंदी अपना गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त नहीं कर पाई।
किसी भी भाषा का विकास उसको व्यवहार में लाने से होता है। भाषा को व्यवहार में लाने का काम जनता करती है। अत: हिंदी को सही अर्थों में राजभाषा बनाने का कार्य सरकार, विश्वविद्यालयों, लेखकों, पत्रकारों व चंद हिंदी प्रेमी बुद्धिजीवियों से अधिक हम सबका है। राष्ट्रीय गौरव व अस्मिता का मुद्दा मानकर हिंदी के लिए जनमानस में आंदोलन का भाव आना चाहिए।
प्रिय पाठकों , शुभ नवरात्रि एवं दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि आप सहित मित्रों के साथ हिन्दू, हिन्दी और भारतीय संस्कृति पर बतौर आंदोलित मन: स्थिति के साथ सदैव इस दिशा में प्रयास जारी रखें। ताकि अपने भारतीय संस्कृति के साथ राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त हिन्दी की रक्षा हो सके।
जय हिन्द.. जय भारत...

शनिवार, 17 सितंबर 2011

श्री बाजपेयी जी कहां हैं.....?

श्री बाजपेयी जी कहां हैं.....? कांशीराम जैसा लुप्त तो नहीं कर दिये गये..?
इस समय नरेन्द्र मोदी बनाम भावी प्रधानमंत्री का उपवास चल रहा हैं लेकिन श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी का कहीं न फोटो दिख रहा है नहीं उनकी कहीं चर्चा ही हो रही है क्या अभी से भाजपा ने उनका बायकाट कर दिया है या कांशी राम जैसा उनका भी हाल कर दिया गया है। कुछ समझ में नहीं आ रहा है, जो चिन्तनीय विषय तो है ही साथ ही साथ गंभीर मुद्दा है, देश की जनता अभी से कयास लगाना चालू कर दी है क्योंकि बसपा प्रमुख मायावती ने भी बसपा सुप्रीमो कांशीराम के साथ भी कुछ ऐसा ही बर्ताव किया गया । जिस समय  एनडीए की सरकार थी और कन्धार कांड हुआ था उस समय उप प्रधान मंत्री आडवानी ने यशवंत सिंह के साथ बाकायदे आतंकवादियों को कंधार तक पहुंचाया गया ..उसी समय भाजपा (आडवानी गुट) ने श्री अटल जी को अधमरा कर दिया था। जिसको बाजपेयी जी राजनीति से सन्यास लेने की घोषणा कर भाजपा की नींद हराम कर दिये थे। बाद में मान मनौव्वल के बाद उन्होंने फिर भाजपा के लिए काम करते रहने का ऐलान किया था । लेकिन इस बात से उनकी  काफी घायल हुयी थी, ठिक उसी तरह जैसा कोई अधमरा वीरपुरूष हो । ऐसे में सवाल उठता है कि..अब श्री बाजपेयी जी कहां हैं यह तो भाजपा वाले ही अच्छे से बता पायेंगे।

बुधवार, 14 सितंबर 2011

पी. चिदंबरम के हिन्दी बोल

 पी. चिदंबरम के हिन्दी बोल उनके लिए घातक
पी. चिदंबरम के हिन्दी बोल उनके लिए घातक
आखिरकार पी. चिदंबरम को हिन्दी बोलना ही पड़ा महामहिम राष्ट्रपति जी के सामने क्योकि इन्हीं महाशय को कार्यक्रम की अध्यक्षता करना पड़ गया ।
शर्म आती ऐसे हिन्दुस्तान के राजनेताओं पर जिनको हिन्दी बिल्कुल भी बोलने नहीं आता। ऐसे में ये हिन्दुस्तान के संस्कृति और भाषा का क्या रक्षा करेंगे...उनके हिन्दी बोलने की बहादूरी पर महामहिम ने सरहना भी कीं।यदि इस शर्मनाक वाकया को विदेशी लोग देख रहे होंगे वे भारत के इस हिन्दी का क्या महत्त्व देंगे..चाहें जो हो लेकिन हिन्दी का श्राप इन महाशय के उपर तो अगले चुनाव में जरूर पड़ेगा...जिसका हूंकार एक बार फिर अन्ना ने भर दी है।